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श्री गणपति अथर्वशीर्ष Shree Ganpati Atharvshirsh

श्री गणपति अथर्वशीर्ष Shree Ganpati Atharvshirsh   Published on: 2018-10-19 00:47:51

Written by Gajanan Krishna Maharaj

ॐ नमस्ते गणपतये।
त्वमेव प्रत्यक्षं तत्वमसि
त्वमेव केवलं कर्ताऽ सि
त्वमेव केवलं धर्ताऽसि
त्वमेव केवलं हर्ताऽसि
त्वमेव सर्वं खल्विदं ब्रह्मासि
त्व साक्षादात्माऽसि नित्यम्।।1।।

ऋतं वच्मि। सत्यं वच्मि।।2।।

अव त्व मां। अव वक्तारं।
अव श्रोतारं। अव दातारं।
अव धातारं। अवानूचानमव शिष्यं।
अव पश्चातात। अव पुरस्तात।
अवोत्तरात्तात। अव दक्षिणात्तात्।
अवचोर्ध्वात्तात्।। अवाधरात्तात्।।
सर्वतो माँ पाहि-पाहि समंतात्।।3।।

त्वं वाङ्‍मयस्त्वं चिन्मय:।
त्वमानंदमसयस्त्वं ब्रह्ममय:।
त्वं सच्चिदानंदाद्वितीयोऽषि।
त्वं प्रत्यक्षं ब्रह्माषि।
त्वं ज्ञानमयो विज्ञानमयोऽषि।।4।।

सर्वं जगदिदं त्वत्तो जायते।
सर्वं जगदिदं त्वत्तस्तिष्ठति।
सर्वं जगदिदं त्वयि लयमेष्यति।
सर्वं जगदिदं त्वयि प्रत्येति।
त्वं भूमिरापोऽनलोऽनिलो नभ:।
त्वं चत्वारिकाकूपदानि।।5।।

त्वं गुणत्रयातीत: त्वमवस्थात्रयातीत:।
त्वं देहत्रयातीत:। त्वं कालत्रयातीत:।
त्वं मूलाधारस्थितोऽसि नित्यं।
त्वं शक्तित्रयात्मक:।
त्वां योगिनो ध्यायंति नित्यं।
त्वं ब्रह्मा त्वं विष्णुस्त्वं
रूद्रस्त्वं इंद्रस्त्वं अग्निस्त्वं
वायुस्त्वं सूर्यस्त्वं चंद्रमास्त्वं
ब्रह्मभूर्भुव:स्वरोम्।।6।।

गणादि पूर्वमुच्चार्य वर्णादिं तदनंतरं।
अनुस्वार: परतर:। अर्धेन्दुलसितं।
तारेण ऋद्धं। एतत्तव मनुस्वरूपं।
गकार: पूर्वरूपं। अकारो मध्यमरूपं।
अनुस्वारश्चान्त्यरूपं। बिन्दुरूत्तररूपं।
नाद: संधानं। सँ हितासंधि:
सैषा गणेश विद्या। गणकऋषि:
निचृद्गायत्रीच्छंद:। गणपतिर्देवता।
ॐ गं गणपतये नम:।।7।।

एकदंताय विद्‍महे।
वक्रतुण्डाय धीमहि।
तन्नो दंती प्रचोदयात।।8।।

एकदंतं चतुर्हस्तं पाशमंकुशधारिणम्।
रदं च वरदं हस्तैर्विभ्राणं मूषकध्वजम्।
रक्तं लंबोदरं शूर्पकर्णकं रक्तवाससम्।
रक्तगंधाऽनुलिप्तांगं रक्तपुष्पै: सुपुजितम्।।
भक्तानुकंपिनं देवं जगत्कारणमच्युतम्।
आविर्भूतं च सृष्टयादौ प्रकृ‍ते पुरुषात्परम्।
एवं ध्यायति यो नित्यं स योगी योगिनां वर:।।9।।

नमो व्रातपतये। नमो गणपतये।
नम: प्रमथपतये।
नमस्तेऽस्तु लंबोदरायैकदंताय।
विघ्ननाशिने शिवसुताय।
श्रीवरदमूर्तये नमो नम:।।10।।

एतदथर्वशीर्ष योऽधीते।
स ब्रह्मभूयाय कल्पते।
स सर्व विघ्नैर्नबाध्यते।
स सर्वत: सुखमेधते।
स पञ्चमहापापात्प्रमुच्यते।।11।।

सायमधीयानो दिवसकृतं पापं नाशयति।
प्रातरधीयानो रात्रिकृतं पापं नाशयति।
सायंप्रात: प्रयुंजानोऽपापो भवति।
सर्वत्राधीयानोऽपविघ्नो भवति।
धर्मार्थकाममोक्षं च विंदति।।12।।

इदमथर्वशीर्षमशिष्याय न देयम्।
यो यदि मोहाद्‍दास्यति स पापीयान् भवति।
सहस्रावर्तनात् यं यं काममधीते तं तमनेन साधयेत्।13।।

अनेन गणपतिमभिषिंचति
स वाग्मी भवति
चतुर्थ्यामनश्र्नन जपति
स विद्यावान भवति।
इत्यथर्वणवाक्यं।
ब्रह्माद्यावरणं विद्यात्
न बिभेति कदाचनेति।।14।।

यो दूर्वांकुरैंर्यजति
स वैश्रवणोपमो भवति।
यो लाजैर्यजति स यशोवान भवति
स मेधावान भवति।
यो मोदकसहस्रेण यजति
स वाञ्छित फलमवाप्रोति।
य: साज्यसमिद्भिर्यजति
स सर्वं लभते स सर्वं लभते।।15।।

अष्टौ ब्राह्मणान् सम्यग्ग्राहयित्वा
सूर्यवर्चस्वी भवति।
सूर्यग्रहे महानद्यां प्रतिमासंनिधौ
वा जप्त्वा सिद्धमंत्रों भवति।
महाविघ्नात्प्रमुच्यते।
महादोषात्प्रमुच्यते।
महापापात् प्रमुच्यते।
स सर्वविद्भवति से सर्वविद्भवति।
य एवं वेद इत्युपनिषद्‍।।16।।

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आदित्यहृदयम् स्तोत्र  Aditya Hriday Stotra

आदित्यहृदयम् स्तोत्र Aditya Hriday Stotra   Published on: 2018-10-19 00:43:04

Written by Gajanan Krishna Maharaj

ततो युद्धपरिश्रान्तं समरे चिन्तया स्थितम्।
रावणं चाग्रतो दृष्टवा युद्धाय समुपस्थितम्।1।

दैवतैश्च समागम्य द्रष्टुमभ्यागतो रणम्।
उपगम्याब्रवीद् राममगरत्यो भगवांस्तदा।2।

राम राम महाबाहो श्रृणु गुह्यं सनातनम्।
येन सर्वानरीन् वत्स समरे विजयिष्यसे।3।

आदित्यहृदयं पुण्यं सर्वशत्रुविनाशनम्।
जयावहं जपं नित्यमक्षयं परमं शिवम्।4।

सर्वमंगलमांगल्यं सर्वपापप्रणाशनम्।
चिन्ताशोकप्रशमनमायुर्वधैनमुत्तमम्।5।

रश्मिमन्तं समुद्यन्तं देवासुरनमस्कृतम्।
पूजयस्व विवस्वन्तं भास्करं भुवनेश्वरम्।6।

सर्वदेवतामको ह्येष तेजस्वी रश्मिभावनः।
एष देवासुरगणाँल्लोकान् पाति गभस्तिभिः।7।

एष ब्रह्मा च विष्णुश्च शिवः स्कन्दः प्रजापतिः।
महेन्द्रो धनदः कालो यमः सोमो ह्यपां पतिः।8।

पितरो वसवः साध्या अश्विनौ मरुतो मनुः।
वायुर्वन्हिः प्रजाः प्राण ऋतुकर्ता प्रभाकरः।9।

आदित्यः सविता सूर्यः खगः पूषा गर्भास्तिमान्।
सुवर्णसदृशो भानुहिरण्यरेता दिवाकरः।10।

हरिदश्वः सहस्रार्चिः सप्तसप्तिर्मरीचिमान्।
तिमिरोन्मथनः शम्भूस्त्ष्टा मार्तण्डकोंऽशुमान्।11।

हिरण्यगर्भः शिशिरस्तपनोऽहरकरो रविः।
अग्निगर्भोऽदितेः पुत्रः शंखः शिशिरनाशनः।12।

व्योमनाथस्तमोभेदी ऋम्यजुःसामपारगः।
घनवृष्टिरपां मित्रो विन्ध्यवीथीप्लवंगमः।13।

आतपी मण्डली मृत्युः पिंगलः सर्वतापनः।
कविर्विश्वो महातेजा रक्तः सर्वभवोदभवः।14।

नक्षत्रग्रहताराणामधिपो विश्वभावनः।
तेजसामपि तेजस्वी द्वादशात्मन् नमोऽस्तु ते।15।

नमः पूर्वाय गिरये पश्चिमायाद्रये नमः।
ज्योतिर्गणानां पतये दिनाधिपतये नमः।16।

जयाय जयभद्राय हर्यश्वाय नमो नमः।
नमो नमः सहस्रांशो आदित्याय नमो नमः।17।

नम उग्राय वीराय सारंगाय नमो नमः।
नमः पद्मप्रबोधाय प्रचण्डाय नमोऽस्तु ते।18।

तमोघ्नाय हिमघ्नाय शत्रुघ्नायामितात्मने।
कृतघ्नघ्नाय देवाय ज्योतिषां पतये नमः।19।

तप्तचामीकराभाय हस्ये विश्वकर्मणे।
नमस्तमोऽभिनिघ्नाय रुचये लोकसाक्षिणे।20।

नाशयत्येष वै भूतं तमेव सृजति प्रभुः।
पायत्येष तपत्येष वर्षत्येष गभस्तिभिः।21।

एष सुप्तेषु जागर्ति भूतेषु परिनिष्ठितः।
एष चैवाग्निहोत्रं च फलं चैवाग्निहोत्रिणाम्।22।

देवाश्च क्रतवश्चैव क्रतूनां फलमेव च।
यानि कृत्यानि लोकेषु सर्वेषु परमप्रभुः।23।

एनमापत्सु कृच्छ्रेषु कान्तारेषु भयेषु च।
कीर्तयन् पुरुषः कश्चिन्नावसीदति राघव।24।

पूजयस्वैनमेकाग्रो देवदेवं जगत्पतिम्।
एतत् त्रिगुणितं जप्तवा युद्धेषु विजयिष्ति।25।

अस्मिन् क्षणे महाबाहो रावणं त्वं जहिष्यसि।
एवमुक्त्वा ततोऽगस्त्यो जगाम स यथागतम्।26।

एतच्छ्रुत्वा महातेजा, नष्टशोकोऽभवत् तदा।
धारयामास सुप्रीतो राघवः प्रयतात्मवान्।27।

आदित्यं प्रेक्ष्य जप्त्वेदं परं हर्षमवाप्तवान्।
त्रिराचम्य शुचिर्भूत्वा धनुरादाय वीर्यवान्।28।

रावणं प्रेक्ष्य हृष्टात्मा जयार्थे समुपागमत्।
सर्वयत्नेन महता वृतस्तस्य वधेऽभवत्।29।

अथ रविरवदन्निरीक्ष्य रामं मुदितनाः परमं प्रहृष्यमाणः।
निशिचरपतिसंक्षयं विदित्वा सुरगणमध्यगतो वचस्त्वरेति।30।

सूर्य मंत्र जाप प्रतिदिन जप करने से सूर्य का बुरा प्रभाव नष्ट हो जाता है I सूर्य मंत्र का प्रयोग सामान्यतया सूर्य के अशुभ प्रभावों को कम करने के लिए किया जाता है I सूर्य मंत्र जातक को सूर्य की सामान्य विशेषताओं से प्राप्त होने वाले लाभ प्रदान करने में सक्षम होता है I इस मंत्र को करने से सरकार अथवा न्यायालयों से जुड़े किसी प्रकार के मामलों का सामना करने का बल मिलता है तथा सरकारी पक्ष से आने वाले निर्णयों को व्यक्ति के पक्ष में कर सकता है I सूर्य की अशुभता के कारण व्यक्ति को सूर्य की सामान्य तथा विशिष्ट विशेषताओं से संबंधित हानी हो सकती है I जिसके निवारण हेतु सूर्य यंत्र को स्थापित करना एक अच्छा उपाय है विशेषकर उस स्थिति में जब सूर्य अशुभ अथवा नकारात्मक रूप से काम कर रहा हो I

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Sankat Nashan Sri Ganesh Stotra By Gajanan Krishna Maharaj Hyderabad

Sankat Nashan Sri Ganesh Stotra By Gajanan Krishna Maharaj Hyderabad   Published on: 2018-09-07 11:33:39

Written by Gajanan Krishna Maharaj

One Of Lord Ganpati's Most Powerful Stotras, Sankat Nashan Ganpati Stotra.

Do Recite Or Listen This Powerful Ganesh Stotra Before Starting Any New Business, Project, Interview, Journey Or To Get Rid Of Any Trouble Etc. 

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शिव पंचाक्षर स्तोत्र  (Shiv Panchakshar Stotra)

शिव पंचाक्षर स्तोत्र (Shiv Panchakshar Stotra)   Published on: 2018-07-28 06:30:05

Written by Gajanan Krishna Maharaj

इस स्तोत्र के पाँचों श्लोकों में क्रमशः न, म, शि, वा और य है अर्थात् नम: शिवाय। यह पूरा स्तोत्र शिवस्वरूप है।

नागेंद्रहाराय त्रिलोचनाय भस्मांग रागाय महेश्वराय। नित्याय शुद्धाय दिगंबराय तस्मे "न" काराय नमः शिवायः॥

हे महेश्वर! आप नागराज को हार स्वरूप धारण करने वाले हैं। हे (तीन नेत्रों वाले) त्रिलोचन आप भष्म से अलंकृत, नित्य (अनादि एवं अनंत) एवं शुद्ध हैं। अम्बर को वस्त्र सामान धारण करने वाले दिग्म्बर शिव, आपकेन अक्षर द्वारा जाने वाले स्वरूप को नमस्कार।

मंदाकिनी सलिल चंदन चर्चिताय नंदीश्वर प्रमथनाथ महेश्वराय।मंदारपुष्प बहुपुष्प सुपूजिताय तस्मे "म" काराय नमः शिवायः॥

चन्दन से अलंकृत, एवं गंगा की धारा द्वारा शोभायमान नन्दीश्वर एवं प्रमथनाथ के स्वामी महेश्वर आप सदा मन्दार पर्वत एवं बहुदा अन्य स्रोतों से प्राप्त्य पुष्पों द्वारा पुजित हैं। हे म धारी शिव, आपको नमन है।

 

शिवाय गौरी वदनाब्जवृंद सूर्याय दक्षाध्वरनाशकाय। श्री नीलकंठाय वृषभद्धजाय तस्मै "शि" काराय नमः शिवायः॥

हे धर्म ध्वज धारी, नीलकण्ठ, शि अक्षर द्वारा जाने जाने वाले महाप्रभु, आपने ही दक्ष के दम्भ यज्ञ का विनाश किया था। माँ गौरी के कमल मुख को सूर्य सामान तेज प्रदान करने वाले शिव, आपको नमस्कार है।

वषिष्ठ कुम्भोद्भव गौतमाय मुनींद्र देवार्चित शेखराय। चंद्रार्क वैश्वानर लोचनाय तस्मै "व" काराय नमः शिवायः॥

देवगणो एवं वषिष्ठ, अगस्त्य, गौतम आदि मुनियों द्वार पुजित देवाधिदेव! सूर्य, चन्द्रमा एवं अग्नि आपके तीन नेत्र सामन हैं। हे शिव आपके व अक्षर द्वारा विदित स्वरूप कोअ नमस्कार है।

यक्षस्वरूपाय जटाधराय पिनाकस्ताय सनातनाय। दिव्याय देवाय दिगंबराय तस्मै "य" काराय नमः शिवायः॥

हे यज्ञ स्वरूप, जटाधारी शिव आप आदि, मध्य एवं अंत रहित सनातन हैं। हे दिव्य अम्बर धारी शिव आपके य अक्षर द्वारा जाने जाने वाले स्वरूप को नमस्कारा है।

पंचाक्षरमिदं पुण्यं यः पठेत् शिव सन्निधौ। शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते॥

जो कोई शिव के इस पंचाक्षर मंत्र का नित्य ध्यान करता है वह शिव के पून्य लोक को प्राप्त करता है तथा शिव के साथ सुख पुर्वक निवास करता है।

॥ इति श्रीमच्छंकराचार्यविरचितं श्रीशिवपञ्चाक्षरस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

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गोपी गीत Gopi Geet

गोपी गीत Gopi Geet   Published on: 2018-03-17 07:19:35

Written by Gajanan Krishna Maharaj

गोप्य ऊचुः
(गोपियाँ विरहावेश में गाने लगीं)

जयति तेऽधिकं जन्मना व्रजः श्रयत इन्दिरा शश्वदत्र हि ।
दयित दृश्यतां दिक्षु तावका स्त्वयि धृतासवस्त्वां विचिन्वते ॥1॥

(हे प्यारे ! तुम्हारे जन्म के कारण वैकुण्ठ आदि लोकों से भी व्रज की महिमा बढ गयी है। तभी तो सौन्दर्य और मृदुलता की देवी लक्ष्मीजी अपना निवास स्थान वैकुण्ठ छोड़कर यहाँ नित्य निरंतर निवास करने लगी है , इसकी सेवा करने लगी है। परन्तु हे प्रियतम ! देखो तुम्हारी गोपियाँ जिन्होंने तुम्हारे चरणों में ही अपने प्राण समर्पित कर रखे हैं , वन वन भटककर तुम्हें ढूंढ़ रही हैं।।)


शरदुदाशये साधुजातसत्सरसिजोदरश्रीमुषा दृशा ।
सुरतनाथ तेऽशुल्कदासिका वरद निघ्नतो नेह किं वधः ॥2॥

(हे हमारे प्रेम पूर्ण ह्रदय के स्वामी ! हम तुम्हारी बिना मोल की दासी हैं। तुम शरदऋतु के सुन्दर जलाशय में से चाँदनी की छटा के सौन्दर्य को चुराने वाले नेत्रों से हमें घायल कर चुके हो । हे हमारे मनोरथ पूर्ण करने वाले प्राणेश्वर ! क्या नेत्रों से मारना वध नहीं है? अस्त्रों से ह्त्या करना ही वध है।।)


विषजलाप्ययाद्व्यालराक्षसाद्वर्षमारुताद्वैद्युतानलात् ।
वृषमयात्मजाद्विश्वतोभया दृषभ ते वयं रक्षिता मुहुः ॥3॥

(हे पुरुष शिरोमणि ! यमुनाजी के विषैले जल से होने वाली मृत्यु , अजगर के रूप में खाने वाली मृत्यु अघासुर , इन्द्र की वर्षा , आंधी , बिजली, दावानल , वृषभासुर और व्योमासुर आदि से एवम भिन्न भिन्न अवसरों पर सब प्रकार के भयों से तुमने बार- बार हम लोगों की रक्षा की है।)


न खलु गोपिकानन्दनो भवानखिलदेहिनामन्तरात्मदृक् ।
विखनसार्थितो विश्वगुप्तये सख उदेयिवान्सात्वतां कुले ॥4॥

(हे परम सखा ! तुम केवल यशोदा के ही पुत्र नहीं हो; समस्त शरीरधारियों के ह्रदय में रहने वाले उनके साक्षी हो,अन्तर्यामी हो । ! ब्रह्मा जी की प्रार्थना से विश्व की रक्षा करने के लिए तुम यदुवंश में अवतीर्ण हुए हो।।)


विरचिताभयं वृष्णिधुर्य ते चरणमीयुषां संसृतेर्भयात् ।
करसरोरुहं कान्त कामदं शिरसि धेहि नः श्रीकरग्रहम् ॥5॥
(हे यदुवंश शिरोमणि ! तुम अपने प्रेमियों की अभिलाषा पूर्ण करने वालों में सबसे आगे हो । जो लोग जन्म-मृत्यु रूप संसार के चक्कर से डरकर तुम्हारे चरणों की शरण ग्रहण करते हैं, उन्हें तुम्हारे कर कमल अपनी छत्र छाया में लेकर अभय कर देते हैं । हे हमारे प्रियतम ! सबकी लालसा-अभिलाषाओ को पूर्ण करने वाला वही करकमल, जिससे तुमने लक्ष्मीजी का हाथ पकड़ा है, हमारे सिर पर रख दो।।)


व्रजजनार्तिहन्वीर योषितां निजजनस्मयध्वंसनस्मित ।
भज सखे भवत्किंकरीः स्म नो जलरुहाननं चारु दर्शय ॥6॥

(हे वीर शिरोमणि श्यामसुंदर ! तुम सभी व्रजवासियों का दुःख दूर करने वाले हो । तुम्हारी मंद मंद मुस्कान की एक एक झलक ही तुम्हारे प्रेमी जनों के सारे मान-मद को चूर-चूर कर देने के लिए पर्याप्त हैं । हे हमारे प्यारे सखा ! हमसे रूठो मत, प्रेम करो । हम तो तुम्हारी दासी हैं, तुम्हारे चरणों पर न्योछावर हैं । हम अबलाओं को अपना वह परमसुन्दर सांवला मुखकमल दिखलाओ।।)


प्रणतदेहिनांपापकर्शनं तृणचरानुगं श्रीनिकेतनम् ।
फणिफणार्पितं ते पदांबुजं कृणु कुचेषु नः कृन्धि हृच्छयम् ॥7॥

(तुम्हारे चरणकमल शरणागत प्राणियों के सारे पापों को नष्ट कर देते हैं। वे समस्त सौन्दर्य, माधुर्यकी खान है और स्वयं लक्ष्मी जी उनकी सेवा करती रहती हैं । तुम उन्हीं चरणों से हमारे बछड़ों के पीछे-पीछे चलते हो और हमारे लिए उन्हें सांप के फणों तक पर रखने में भी तुमने संकोच नहीं किया । हमारा ह्रदय तुम्हारी विरह व्यथा की आग से जल रहा है तुम्हारी मिलन की आकांक्षा हमें सता रही है । तुम अपने वे ही चरण हमारे वक्ष स्थल पर रखकर हमारे ह्रदय की ज्वाला शांत कर दो।।) 


गिरा वल्गुवाक्यया बुधमनोज्ञया पुष्करेक्षण ।
वीर मुह्यतीरधरसीधुनाऽऽप्याययस्व नः ॥8॥

(हे कमल नयन ! तुम्हारी वाणी कितनी मधुर है । तुम्हारा एक एक शब्द हमारे लिए अमृत से बढकर मधुर है । बड़े बड़े विद्वान उसमे रम जाते हैं । उसपर अपना सर्वस्व न्योछावर कर देते हैं । तुम्हारी उसी वाणी का रसास्वादन करके तुम्हारी आज्ञाकारिणी दासी गोपियाँ मोहित हो रही हैं । हे दानवीर ! अब तुम अपना दिव्य अमृत से भी मधुर अधर-रस पिलाकर हमें जीवन-दान दो, छका दो।।)


तव कथामृतं तप्तजीवनं कविभिरीडितं कल्मषापहम् ।
श्रवणमङ्गलं श्रीमदाततं भुवि गृणन्ति ते भूरिदा जनाः ॥9॥

(हे प्रभो ! तुम्हारी लीला कथा भी अमृत स्वरूप है । विरह से सताए हुये लोगों के लिए तो वह सर्वस्व जीवन ही है। बड़े बड़े ज्ञानी महात्माओं - भक्तकवियों ने उसका गान किया है, वह सारे पाप - ताप तो मिटाती ही है, साथ ही श्रवण मात्र से परम मंगल - परम कल्याण का दान भी करती है । वह परम सुन्दर, परम मधुर और बहुत विस्तृत भी है । जो तुम्हारी उस लीलाकथा का गान करते हैं, वास्तव में भू-लोक में वे ही सबसे बड़े दाता हैं।।) 


प्रहसितं प्रिय प्रेमवीक्षणं विहरणं च ते ध्यानमङ्गलम् ।
रहसि संविदो या हृदिस्पृशः कुहक नो मनः क्षोभयन्ति हि ॥10॥

(हे प्यारे ! एक दिन वह था , जब तुम्हारे प्रेम भरी हंसी और चितवन तथा तुम्हारी तरह तरह की क्रीडाओं का ध्यान करके हम आनंद में मग्न हो जाया करती थी । उनका ध्यान भी परम मंगलदायक है , उसके बाद तुम मिले । तुमने एकांत में ह्रदय-स्पर्शी ठिठोलियाँ की, प्रेम की बातें कहीं । हे छलिया ! अब वे सब बातें याद आकर हमारे मन को क्षुब्ध कर देती हैं।।)


चलसि यद्व्रजाच्चारयन्पशून् नलिनसुन्दरं नाथ ते पदम् ।
शिलतृणाङ्कुरैः सीदतीति नः कलिलतां मनः कान्त गच्छति ॥11॥

(हे हमारे प्यारे स्वामी ! हे प्रियतम ! तुम्हारे चरण, कमल से भी सुकोमल और सुन्दर हैं । जब तुम गौओं को चराने के लिये व्रज से निकलते हो तब यह सोचकर कि तुम्हारे वे युगल चरण कंकड़, तिनके, कुश एंव कांटे चुभ जाने से कष्ट पाते होंगे; हमारा मन बेचैन होजाता है । हमें बड़ा दुःख होता है।।)


दिनपरिक्षये नीलकुन्तलैर्वनरुहाननं बिभ्रदावृतम् ।
घनरजस्वलं दर्शयन्मुहुर्मनसि नः स्मरं वीर यच्छसि ॥12॥

(हे हमारे वीर प्रियतम ! दिन ढलने पर जब तुम वन से घर लौटते हो तो हम देखतीं हैं की तुम्हारे मुख कमल पर नीली नीली अलकें लटक रही हैं और गौओं के खुर से उड़ उड़कर घनी धुल पड़ी हुई है । तुम अपना वह मनोहारी सौन्दर्य हमें दिखा दिखाकर हमारे ह्रदय में मिलन की आकांक्षा उत्पन्न करते हो।।)


प्रणतकामदं पद्मजार्चितं धरणिमण्डनं ध्येयमापदि ।
चरणपङ्कजं शंतमं च ते रमण नः स्तनेष्वर्पयाधिहन् ॥13॥

(हे प्रियतम ! एकमात्र तुम्हीं हमारे सारे दुखों को मिटाने वाले हो । तुम्हारे चरण कमल शरणागत भक्तों की समस्त अभिलाषाओं को पूर्ण करने वाले है । स्वयं लक्ष्मी जी उनकी सेवा करती हैं । और पृथ्वी के तो वे भूषण ही हैं । आपत्ति के समय एकमात्र उन्हीं का चिंतन करना उचित है जिससे सारी आपत्तियां कट जाती हैं । हे कुंजबिहारी ! तुम अपने उन परम कल्याण स्वरूप चरण हमारे वक्षस्थल पर रखकर हमारे ह्रदय की व्यथा शांत कर दो।।)


सुरतवर्धनं शोकनाशनं स्वरितवेणुना सुष्ठु चुम्बितम् ।
इतररागविस्मारणं नृणां वितर वीर नस्तेऽधरामृतम् ॥14॥

(हे वीर शिरोमणि ! तुम्हारा अधरामृत मिलन के सुख को को बढ़ाने वाला है । वह विरहजन्य समस्त शोक संताप को नष्ट कर देता है । यह गाने वाली बांसुरी भलीभांति उसे चूमती रहती है । जिन्होंने उसे एक बार पी लिया, उन लोगों को फिर अन्य सारी आसक्तियों का स्मरण भी नहीं होता । अपना वही अधरामृत हमें पिलाओ।।)


अटति यद्भवानह्नि काननं त्रुटिर्युगायते त्वामपश्यताम् ।
कुटिलकुन्तलं श्रीमुखं च ते जड उदीक्षतां पक्ष्मकृद्दृशाम् ॥15॥

(हे प्यारे ! दिन के समय जब तुम वन में विहार करने के लिए चले जाते हो, तब तुम्हें देखे बिना हमारे लिए एक एक क्षण युग के समान हो जाता है और जब तुम संध्या के समय लौटते हो तथा घुंघराली अलकों से युक्त तुम्हारा परम सुन्दर मुखारविंद हम देखती हैं, उस समय पलकों का गिरना भी हमारे लिए अत्यंत कष्टकारी हो जाता है और ऐसा जान पड़ता है की इन पलकों को बनाने वाला विधाता मूर्ख है।।)


पतिसुतान्वयभ्रातृबान्धवानतिविलङ्घ्य तेऽन्त्यच्युतागताः ।
गतिविदस्तवोद्गीतमोहिताः कितव योषितः कस्त्यजेन्निशि ॥16॥

(हे हमारे प्यारे श्याम सुन्दर ! हम अपने पति-पुत्र, भाई -बन्धु, और कुल परिवार का त्यागकर, उनकी इच्छा और आज्ञाओं का उल्लंघन करके तुम्हारे पास आयी हैं । हम तुम्हारी हर चाल को जानती हैं, हर संकेत समझती हैं और तुम्हारे मधुर गान से मोहित होकर यहाँ आयी हैं । हे कपटी ! इस प्रकार रात्रि के समय आयी हुई युवतियों को तुम्हारे सिवा और कौन छोड़ सकता है।।)


रहसि संविदं हृच्छयोदयं प्रहसिताननं प्रेमवीक्षणम् ।
बृहदुरः श्रियो वीक्ष्य धाम ते मुहुरतिस्पृहा मुह्यते मनः ॥17॥

(हे प्यारे ! एकांत में तुम मिलन की इच्छा और प्रेम-भाव जगाने वाली बातें किया करते थे । ठिठोली करके हमें छेड़ते थे । तुम प्रेम भरी चितवन से हमारी ओर देखकर मुस्कुरा देते थे और हम तुम्हारा वह विशाल वक्ष:स्थल देखती थीं जिस पर लक्ष्मी जी नित्य निरंतर निवास करती हैं । हे प्रिये ! तबसे अब तक निरंतर हमारी लालसा बढ़ती ही जा रही है और हमारा मन तुम्हारे प्रति अत्यंत आसक्त होता जा रहा है।।)


व्रजवनौकसां व्यक्तिरङ्ग ते वृजिनहन्त्र्यलं विश्वमङ्गलम् ।
त्यज मनाक् च नस्त्वत्स्पृहात्मनां स्वजनहृद्रुजां यन्निषूदनम् ॥18॥

(हे प्यारे ! तुम्हारी यह अभिव्यक्ति व्रज-वनवासियों के सम्पूर्ण दुःख ताप को नष्ट करने वाली और विश्व का पूर्ण मंगल करने के लिए है । हमारा ह्रदय तुम्हारे प्रति लालसा से भर रहा है । कुछ थोड़ी सी ऐसी औषधि प्रदान करो, जो तुम्हारे निज जनो के ह्रदय रोग को सर्वथा निर्मूल कर दे।।)


यत्ते सुजातचरणाम्बुरुहं स्तनेष भीताः शनैः प्रिय दधीमहि कर्कशेषु ।
तेनाटवीमटसि तद्व्यथते न किंस्वित् कूर्पादिभिर्भ्रमति धीर्भवदायुषां नः ॥19॥

(हे श्रीकृष्ण ! तुम्हारे चरण, कमल से भी कोमल हैं । उन्हें हम अपने कठोर स्तनों पर भी डरते डरते रखती हैं कि कहीं उन्हें चोट न लग जाय । उन्हीं चरणों से तुम रात्रि के समय घोर जंगल में छिपे-छिपे भटक रहे हो । क्या कंकड़, पत्थर, काँटे आदि की चोट लगने से उनमे पीड़ा नहीं होती ? हमें तो इसकी कल्पना मात्र से ही चक्कर आ रहा है । हम अचेत होती जा रही हैं । हे प्यारे श्यामसुन्दर ! हे प्राणनाथ ! हमारा जीवन तुम्हारे लिए है, हम तुम्हारे लिए जी रही हैं, हम सिर्फ तुम्हारी हैं।।)

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Rin Mochak Mangal Stotra  ऋण मोचक मंगल स्तोत्र 

Rin Mochak Mangal Stotra ऋण मोचक मंगल स्तोत्र    Published on: 2017-12-06 09:21:20

Written by Gajanan Krishna Maharaj

मङ्गलो भूमिपुत्रश्च ऋणहर्ता धनप्रदः।

स्थिरासनो महाकयः सर्वकर्मविरोधकः ॥1॥

लोहितो लोहिताक्षश्च सामगानां कृपाकरः।

धरात्मजः कुजो भौमो भूतिदो भूमिनन्दनः॥2॥

अङ्गारको यमश्चैव सर्वरोगापहारकः।

व्रुष्टेः कर्ताऽपहर्ता च सर्वकामफलप्रदः॥3॥

एतानि कुजनामनि नित्यं यः श्रद्धया पठेत्।

ऋणं न जायते तस्य धनं शीघ्रमवाप्नुयात्॥4॥

धरणीगर्भसम्भूतं विद्युत्कान्तिसमप्रभम्।

कुमारं शक्तिहस्तं च मङ्गलं प्रणमाम्यहम्॥5॥

स्तोत्रमङ्गारकस्यैतत्पठनीयं सदा नृभिः।

न तेषां भौमजा पीडा स्वल्पाऽपि भवति क्वचित्॥6॥

अङ्गारक महाभाग भगवन्भक्तवत्सल।

त्वां नमामि ममाशेषमृणमाशु विनाशय॥7॥

ऋणरोगादिदारिद्रयं ये चान्ये ह्यपमृत्यवः।

भयक्लेशमनस्तापा नश्यन्तु मम सर्वदा॥ 8 ||

अतिवक्त्र दुरारार्ध्य भोगमुक्त जितात्मनः।

तुष्टो ददासि साम्राज्यं रुश्टो हरसि तत्ख्शणात्॥9॥

विरिंचिशक्रविष्णूनां मनुष्याणां तु का कथा।

तेन त्वं सर्वसत्त्वेन ग्रहराजो महाबलः॥10॥

पुत्रान्देहि धनं देहि त्वामस्मि शरणं गतः।

ऋणदारिद्रयदुःखेन शत्रूणां च भयात्ततः॥11॥

एभिर्द्वादशभिः श्लोकैर्यः स्तौति च धरासुतम्।

महतिं श्रियमाप्नोति ह्यपरो धनदो युवा॥12॥

|| इति श्री ऋणमोचक मङ्गलस्तोत्रम् सम्पूर्णम् ||

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बजरंग बाण  Bajrang Baan

बजरंग बाण Bajrang Baan   Published on: 2017-11-27 21:48:14

Written by Gajanan Krishna Maharaj

दोहा 
निश्चय प्रेम प्रतीति ते, विनय करै सनमान ।
तेहि कारज सकल शुभ, सिद्ध करै हनुमान ।।

चौपाई 
जय हनुमंत संत हितकारी ।
सुनि लीजै प्रभु बिनय हमारी ।।

जन के काज विलंब ना कीजै ।
आतुर दौरि महासुख दीजै ।।

जैसे कूदि सिंधु के पारा ।
सुरसा बदन पैठि बिस्तारा ।।

आगे जाय लंकिनी रोका ।
मारेहु लात गई सुरलोका ।।

जाय बिभीषन को सुख दीन्हा ।
सीता निरखि परम पद लीन्हा ।।

बाग उजारि सिंधु महँ बोरा ।
अति आतुर जमकातर तोरा ।।

अछय कुमार मारि संहारा ।
लूम लपेट लंक को जारा ।।

लाह समान लंक जरि गई ।
जय जय धुनि सुरपुर नभ भई ।।

अब बिलम्ब केहि कारन स्वामी ।
कृपा करहु उर अंतरजामी ।।

जय जय लखन प्रान के दाता ।
आतुर ह्वै दुख करहु निपाता ।।

जय हनुमान जयति बल सागर ।
सूर समूह समरथ भट नागर ।।

ऊँ हनु हनु हनु हनुमंत हठीलै ।
बैरिहि मारु वज्र की कीलै ।।

ऊँ हीं हीं हीं हनुमंत कपीसा ।
ऊँ हुं हुं हुं हनु अरि उस सीसा ।।

जय अंजनि कुमार बलवंता ।
संकरसुवन बीर हनुमंता ।।

बदन कराल काल कुल घालक ।
राम सहाय सदा प्रतिपालक ।।

भूत, प्रेत, पिसाच, निसाचर ।
अगनि बेताल काल मारी मर ।।

इन्हें मारु, तोहि सपथ राम की ।
राखु नाथ मरजाद नाम की ।।

सत्य होहु हरि सपथ पाइ कै ।
रामदूत धरु मारु धाइ कै ।।

जय जय जय हनुमंत अगाधा ।
दुख पावत जन केहि अपराधा ।।

पूजा जप तप नेम अचारा ।
नहि जानत कछु दास तुम्हारा ।।

बन उपबन मग गिरि गृह माहीं ।
तुम्हरे बल हौं डरपत नाहीं ।।

जनकसुता हरि दास कहावौ ।
ता की सपथ, बिलंब न लावौ ।।

जय जय जय धुनि होत अकासा ।
सुमिरत होय दुसह दुख नासा ।।

चरन पकरि, कर जोरि मनावौ ।
यहि औसर अब केहि गोहरावौं ।।

उठ, उठ, चलु, तोहि राम दौहाई ।
पायँ परौं, कर जोरि मनाई ।।

ऊँ चम चम चम चम चपल चलंता ।
ऊँ हनु हनु हनु हनु हनु हनुमंता ।।

ऊँ हं हं हाँक देत कपि चंचल ।
ऊँ सं सं सहमि पराने खल दल ।।

अपने जन को तुरत उबारौ ।
सुमिरत होय अनंद हमारौ ।।

यह बजरंग बाण जेहि मारै ।
ताहि कहौ फिरि कवन उबारै ।।

पाठ करै बजरंग बाण की ।
हनुमत रच्छा करैं प्रान की ।।

यह बजरंग बाण जो जापैं ।
तासों भूत प्रेत सब काँपै ।।

धूप देय जो जपै हमेसा ।

ता के तन नहिं रहै कलेसा ।।

दोहा
उर प्रतीति दृढ़, सरन ह्वै, पाठ करै ध्यान ।।
बाधा सब हर, करै सब काम सफल हनुमान ।।

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संकष्टमोचन स्तोत्र Sankat Mochan Stotra

संकष्टमोचन स्तोत्र Sankat Mochan Stotra   Published on: 2017-11-27 21:45:03

Written by Gajanan Krishna Maharaj

सिन्दूरपूररुचिरो बलवीर्यसिन्धु –
र्बुद्धिप्रवाहनिधिरद्भुतवैभवश्री: ।
दीनार्तिदावदहनो वरदो वरेण्य:
संकष्टमोचनविभुस्तनुतां शुभं न: ।।

सोत्साहलड़्घितमहार्णवपौरुषश्री –
र्लड़्कापुरीप्रदहनप्रथितप्रभाव: ।
घोराहवप्रमथितारिचमूप्रवीर:
प्राभंजनिर्जयति मर्कटसार्वभौम: ।।

द्रौणाचलानयनवर्णितभव्यभूति:
श्रीरामलक्ष्मणसहायकचक्रवर्ती ।
काशीस्थदक्षिणविराजितसौधमल्ल:
श्रीमारुतिर्विजयते भगवान महेश: ।।

नूनं स्मृतोsपि दयते भजतां कपीन्द्र:
सम्पूजितो दिशति वांछितसिद्धिवृद्धिम ।
सम्मोदकप्रिय उपैति परं प्रहर्षं
रामायणश्रवणत: पठतां शरण्य: ।।

श्रीभारतप्रवरयुद्धरथोद्धतश्री:
पार्थैककेतनकरालविशालमूर्ति: ।
उच्चैर्घनाघनघटाविकटाट्टहास:
श्रीकृष्णपक्षभरण: शरणं ममास्तु ।।

जड़्घालजड़्घ उपमातिविदूरवेगो
मुष्टिप्रहारपरिमूर्च्छितराक्षसेन्द्र: ।
श्रीरामकीर्तितपराक्रमणोद्धवश्री: ।
प्राकम्पनिर्विभुरुदंचतु भूतये न: ।।

सीतार्दिदारुणपटु: प्रबल: प्रतापी
श्रीराघवेन्द्रपरिरम्भवरप्रसाद: ।
वर्णीश्वर: सविधिशिक्षितकालनेमि:
पंचाननोsपनयतां विपदोsधिदेशम ।।

उद्यद्भानुसहस्त्रसंनिभतनु: पीताम्बरालड़्कृत:
प्रोज्ज्वालानलदीप्यमाननयनो निष्पिष्टरक्षोगण: ।
संवर्तोद्यतवारिदोद्धतरव: प्रोच्चैर्गदाविभ्रम:
श्रीमान मारुतनन्दन: प्रतिदिनं ध्येयो विपद्भंजन: ।।

रक्ष: पिशाचभयनाशनमामयाधि –
प्रोच्चैर्ज्वरापहरणं दमनं रिपूणाम ।
सम्पत्तिपुत्रकरणं विजयप्रदानं
संकष्टमोचनविभो: स्तवनं नराणाम ।।

दारिद्रयदु:खदहनं विजयं विवादे
कल्याणसाधनममंगलवारणं च ।
दाम्पत्यदीर्घसुखसर्वमनोरथाप्तिं
श्रीमारुते: स्तवशतावृतिरातनोति ।।

स्तोत्रं य एतदनुवासरमस्तकाम:
श्रीमारुतिं समनुचिन्त्य पठेत सुधीर: ।
तस्मै प्रसादसुमुखो वरवानरेन्द्र:
साक्षात्कृतो भवति शाश्वतिक: सहाय: ।।

संकष्टमोचनस्तोत्रं शंकराचार्यभिक्षुणा ।
महेश्वरेण रचितं मारुतेश्चरणेsर्पितम ।।

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श्रीहनुमत्सहस्त्रनाम स्तोत्रम Sri Hanumat Sahastranaam Stotra

श्रीहनुमत्सहस्त्रनाम स्तोत्रम Sri Hanumat Sahastranaam Stotra   Published on: 2017-11-27 21:37:46

Written by Gajanan Krishna Maharaj

हनुमान्श्रीप्रदो वायुपुत्रो रुद्रोsनघोsजर: ।
अमृत्युर्वीरवीरश्च ग्रामवासो जनाश्रय: ।।1।।

धनदो निर्गुणोsकायो वीरो निधिपतिर्मुनि: ।
पिंड्गाक्षो वरदो वाग्मी सीताशोकविनाशन: ।।2।।

शिव: सर्व: परोsव्यक्तो व्यक्ताव्यक्तो रसाधर: ।
पिंड्गकेश: पिंड्गरोमा श्रुतिगम्य: सनातन: ।।3।।

अनादिर्भगवान देवो विश्वहेतुर्निरामय: ।
आरोग्यकर्ता विश्वेशो विश्वनाथो हरीश्वर: ।।4।।

भर्गो रामो रामभक्त: कल्याणप्रकृति: स्थिर: ।
विश्वम्भरो विश्वमूर्तिर्विश्वाकारोsथ विश्वप: ।।5।।

विश्वात्मा विश्वसेव्योsथ विश्वो विश्वहरो रवि: ।
विश्वचेष्टो विश्वगम्यो विश्वध्येय: कलाधर: ।।6।।

प्लवंड्गम: कपिश्रेष्ठो ज्येष्ठो वैद्यो वनेचर: ।
बालो वृद्धो युवा तत्वं तत्वगम्य: ह्यज: ।।7।।

अंजनासूनूरव्यग्रो ग्रामख्यातो धराधर: ।
भूर्भुव: स्वर्महर्लाको जनलोकस्तपोsव्यय: ।।8।।

सत्यमोंकारगम्यश्च प्रणवो व्यापकोsमल: ।
शिवधर्मप्रतिष्ठाता रामेष्ट: फाल्गुनप्रिय: ।।9।।

गोष्पदीकृतवारीश: पूर्णकामो धरापति: ।
रक्षोघ्न: पुण्डरीकाक्ष: शरणागतवत्सल: ।।10।।

जानकीप्राणदाता च रक्ष:प्राणापहारक: ।
पूर्ण: सत्य: पीतवासा दिवाकरसमप्रभ: ।।11।।

देवोद्यानविहारी च देवताभयभंजन: ।
भक्तोदयो भक्तलब्धो भक्तपालनतत्पर: ।।12।।

द्रोणहर्ता शक्तिनेता शक्तिराक्षसमारक: ।
अक्षघ्नो रामदूतश्च शाकिनीजीवहारक: ।।13।।

बुबुकारहतारातिर्गर्वपर्वतमर्दन: ।
हेतुस्त्वहेतु: प्रांशुश्च विश्वभर्ता जगदगुरु: ।।14।।

जगन्नेता जगन्नाथो जगदीशो जनेश्वर: ।
जगद्धितो हरि: श्रीशो गरुडस्मयभंजन: ।।15।।

पार्थध्वजो वायुपुत्रोsमितपुच्छोsमितविक्रम: ।
ब्रह्मपुच्छ: परब्रह्मपुच्छो रामेष्टकारक: ।।16।।

सुग्रीवादियुतो ज्ञानी वानरो वानरेश्वर: ।
कल्पस्थायी चिरंजीवी तपनश्च सदाशिव: ।।17।।

सन्नत: सद्गतिर्भुक्तिमुक्तिद: कीर्तिदायक: ।
कीर्ति: कीर्तिप्रदश्चैव समुद्र: श्रीपद: शिव: ।।18।।

भक्तोदयो भक्तगम्यो भक्तभाग्यप्रदायक: ।
उदधिक्रमणो देव: संसारभयनाशन: ।।19।।

वार्धिबन्धनकृद विश्वजेता विश्वप्रतिष्ठित: ।
लंकारि: कालपुरुषो लंकेशगृहभंजन: ।।20।।

भूतावासो वासुदेवो वसुस्त्रिभुवनेश्वर: ।
श्रीरामरूप: कृष्णस्तु लंकाप्रासादभण्जक: ।।21।।

कृष्ण: कृष्णस्तुत: शान्त: शान्तिदो विश्वपावन: ।
विश्वभोक्ताथ मारघ्नो ब्रह्मचारी जितेन्द्रिय: ।।22।।

ऊर्ध्वगो लांड़्गुली माली लांड़्गूलाहतराक्षस: ।
समीरतनुजो वीरो वीरतारो जयप्रद: ।।23।।

जगन्मंड्गलद: पुण्य: पुण्य़श्रवणकीर्तन: ।
पुण्य़कीर्ति: पुण्यगतिर्जगत्पावनपावन: ।।24।।

देवेशो जितमारोsथ रामभक्तिविधायक: ।
ध्याता ध्येयो लय: साक्षी चेता चैतन्यविग्रह: ।।25।।

ज्ञानद: प्राणद: प्राणो जगत्प्राण: समीरण: ।
विभीषणप्रिय: शूर: पिप्पलाश्रयसिद्धिद: ।।26।।

सिद्ध: सिद्धाश्रय: कालो महोक्ष: कालजान्तक: ।
लंड्केशनिधनस्थायी लंड्कादाहक ईश्वर: ।।27।।

चन्द्रसूर्याग्निनेत्रश्च कालाग्नि: प्रलयान्तक: ।
कपिल: कपिश: पुण्यराशिर्द्वादशराशिग: ।।28।।।

सर्वाश्रयोsप्रमेयात्मा रेवत्यादिनिवारक: ।
लक्ष्मणप्राणदाता च सीताजीवनहेतुक: ।।29।।

रामध्येयो हृषीकेशो विष्णुभक्तो जटी बली ।
देवारिदर्पहा होता धाता कर्ता जगत्प्रभु: ।।30।।

नगरग्रामपालश्च शुद्धो बुद्धो निरत्रप: ।
निरंजनो निर्विकल्पो गुणातीतो भयंकर: ।।31।।

हनुमांश्च दुराराध्यस्तप:साध्यो महेश्वर: ।
जानकीधनशोकोत्थथापहर्ता परात्पर: ।।32।।

वाड़्मय: सदसद्रुप: कारणं प्रकृते: पर: ।
भाग्यदो निर्मलो नेता पुच्छलंड़्काविदाहक: ।।33।।

पुच्छबद्धयातुधानो यातुधान्रिपुप्रिय: ।
छायापहारी भूतेशो लोकेश: सदगतिप्रद: ।।34।।

प्लवंड़्मेश्वर: क्रोध: क्रोधसंरक्तलोचन: ।
सौम्यो गुरु: काव्यकर्ता भक्तानां च वरप्रद: ।।35।।

भक्तानुकम्पी विश्वेश: पुरुहूत: पुरंदर: ।
क्रोधहर्ता तमोहर्ता भक्ताभयवरप्रद: ।।36।।

अग्निर्विभावसुर्भास्वान यमो निरऋतिरेव च ।
वरुणो वायुगतिमान वायु: कौबोर ईश्वर: ।।37।।

रविश्चन्द्र: कुज: सौम्यो गुरु: काव्य: शनैश्चर: ।
राहु: केतुर्मरुद्धोता दाता हर्ता समीरज: ।।38।।

मशकीकृतदेवारिर्दैत्यारिर्मधुसूदन: ।
काम: कपि: कामपाल: कपिलो विश्वजीवन: ।।39।।

भागीरथीपदाम्भोज: सेतुबन्धविशारद: ।
स्वाहा स्वधा हवि: कव्यं हव्यवाहकप्रकाशक: ।।40।।

स्वप्रकाशो महावीरो लघुरूर्जितविक्रम: ।
उड्डीनोड्डीनगतिमान सदगति: पुरुषोत्तम: ।।41।।

जगदात्मा जगद्योनिर्जगदन्तो ह्यनन्तक: ।
विप्पाप्मा निष्कलंड़्कोsथ महान महदहड़्कृति: ।।42।।

खं वायु: पृथिवी चापो वह्निर्दिक्पाल एव च ।
क्षेत्रज्ञ: क्षेत्रहर्ता च पल्वलीकृतसागर: ।।43।।

हिरण्यमय: पुराण्श्च खेचरो भूचरोsमर: ।
हिरण्यगर्भ: सूत्रात्मा राजराजो विशाम्पति: ।।44।।

वेदान्तवेद्य उद्गीथो वेदवेदांड़्गपारग: ।
प्रतिग्रामस्थिति: सद्य:स्फूर्तिदाता गुणाकर: ।।45।।

नक्षत्रमाली भूतात्मा सुरभि: कल्पपादप: ।
चिन्तामणिर्गुणनिधि: प्रजाधारो ह्यनुत्तम: ।।46।।

पुण्यश्लोक: पुरारातिर्ज्योतिष्माण्शर्वरीपति: ।
किलकिलारावसंत्रस्तभूतप्रेतपिशाचक: ।।47।।

ऋणत्रयहर: सूक्ष्म: स्थूल: सर्वगति: पुमान ।
अपस्मारहर: स्मर्ता श्रुतिर्गाथा स्मृतिर्मनु: ।।48।।

स्वर्गद्वारं प्रजाद्वारं मोक्षद्वारं यतीश्वर: ।
नादरूप: परं ब्रह्म ब्रह्म ब्रह्मपुरातन: ।।49।।

एकोsअनेको जन: शुक्ल: स्वयण्ज्योतिरनाकुल: ।
ज्योतिर्ज्योतिरनादिश्च सात्त्विको राजसस्तम: ।।50।।

तमोहर्ता निरालम्बो निराकारो गुणाकर: ।
गुणाश्रयो गुणमयो बृहत्कर्मा बृ्हद्यशा: ।।51।।

बृहद्धनुर्बृहत्पादो बृहन्मूर्धा बृहत्स्वन: ।
बृहत्कर्णो बृहन्नासो बृहद्धाहुर्बृहत्तनु: ।।52।।

बृहज्जानुर्बृहत्कार्यो बृहत्पुच्छो बृहत्कर: ।
बृहद्गतिर्बृहत्सेव्यो बृहल्लोकफलप्रद: ।।53।।

बृहच्छक्तिर्बृहद्वाण्छाफलदो बृहदीश्वर: ।
बृहल्लोकनुतो द्रष्टा विद्यादाता जगद्गुरु: ।।54।।

देवाचार्य: सत्यवादी ब्रह्मवादी कलाधर: ।
सप्तपातालगामी च मलयाचलसंश्रय: ।।55।।

उत्तराशास्थित: श्रीदो दिव्यौषधिवश: खग: ।
शाखामृग: कपीन्द्रोsथ पुराणश्रुतिचण्चु: ।।56।।

चतुरब्राह्मणो योगी योगगम्य: परावर: ।
अनादिनिधनो व्यासो वैकुण्ठ: पृथिवीपति: ।।57।।

अपराजितो जिताराति: सदानन्दो दयायुत: ।
गोपालो गोपतिर्गोप्ता कलिकालपराशर: ।।58।।

मनोवेगी सदायोगी संसारभयनाशन: ।
तत्त्वदाताथ तत्त्वज्ञस्तत्त्वं तत्वप्रकाशक: ।।59।।

शुद्धो बुद्धो नित्यमुक्तो भक्तराजो जयद्रथ: ।
प्रलयोsमितमायश्च मायातीतो विमत्सर: ।।60।।

मायाभर्जितरक्षाश्च मायानिर्मितविष्टप: ।
मायाश्रयश्च निर्लेपो मायानिर्वर्तक: सुखम ।।61।।

सुखी सुखप्रदो नागो महेशकृतसंस्तव: ।
महेश्वर: सत्यसंध: शरभ: कलिपावन: ।।62।।

सहस्त्रकन्धरबलविध्वंसनविचक्षण: ।
सहस्त्रबाहु: सहजो द्विबाहुर्द्विभुजोsमर: ।।63।।

चतुर्भुजो दशभुजो हयग्रीव: खगानन: ।
कपिवक्त्र: कपिपतिर्नरसिंहो महाद्युति: ।।64।।

भीषणो भावगो वन्द्यो वराहो वायुरूपधृक ।
लक्ष्मणप्राणदाता च पराजितदशानन: ।।65।।

पारिजातनिवासी च वटुर्वचनकोविद: ।
सुरसास्यविनिर्मुक्त: सिंहिकाप्राणहारक: ।।66।।

लंड़्कालंड़्कारविध्वंसी वृषदंशकरूपधृक ।
रात्रिसंचारकुशलो रात्रिंचरगृहाग्निद: ।।67।।

किंड़रान्तकरो जम्बुमालिहन्तोग्ररूपधृक ।
आकाशचारी हरिगो मेघनादरणोत्सुक: ।।68।।

मेघगंभीर निनदो महारावणकुलान्तक: ।
कालनेमिप्राणहारी मकरीशापमोक्षद: ।।69।।

रसो रसज्ञ: सम्मानो रूपं चक्षु: श्रुतिर्वच: ।
घ्राणो गन्ध: स्पर्शनं च स्पर्शोsहंड़्कारमानग: ।।70।।

नेतिनेतीतिगम्यश्च वैकुण्ठभजनप्रिय: ।
गिरीशो गिरिजाकान्तो दुर्वासा: कविरंड़्गिरा: ।।71।।

भृगुर्वसिष्ठश्च्यवनो नारदस्तुम्बरोsमल: ।
विश्वक्षेत्रो विश्वबीजो विश्वनेत्रश्च विश्वप: ।।72।।

याजको यजमानश्च पावक: पितरस्तथा ।
श्रद्धा बुद्धि: क्षमा तन्द्रा मन्त्रो मन्त्रयिता स्वर: ।।73।।

राजेन्द्रो भूपती रुण्डमाली संसारसारथि: ।
नित्यसम्पूर्णकामश्च भक्तकामधुगुत्तम: ।।74।।

गणप: केशवो भ्राता पिता माता च मारुति: ।
सहस्त्रमूर्द्धानेकास्य: सहस्त्राक्ष: सहस्त्रपात ।।75।।

कामजित कामदहन: काम: कामफलप्रद: ।
मुद्रापहारी रक्षोघ्न: क्षितिभारहरो बल: ।।76।।

नखंदष्ट्रायुधो विष्णुर्भक्ताभयवरप्रद: ।
दर्पहा दर्पदो दंष्ट्राशतमूर्तिरमूर्तिमान ।।77।।

महानिधिर्महाभागो महाभर्गो महर्द्धिद: ।
महाकारो महायोगी महातेजा महाद्युति: ।।78।।

महासनो महानादो महामन्त्रो महामति: ।
महागमो महोदारो महादेवात्मको विभु: ।।79।।

रौद्रकर्मा क्रूरकर्मा रत्नलाभ: कृतागम: ।
अम्भोधिलड्घन: सिंह: सत्यधर्मप्रमोदन: ।।80।।

जितामित्रो जय: सोमो विजयो वायुनन्दन: ।
जीवदाता सहस्त्रांशुर्मुकुन्दो भूरिदक्षिण: ।।81।।

सिद्धार्थ: सिद्धिद: सिद्धसंकल्प: सिद्धिहेतुक: ।
सप्तपातालचरण: सप्तर्षिगणवन्दित: ।।82।।

सप्ताब्धिलंड्घनो वीर: सप्तद्वीपोरुमण्दल: ।
सप्तांगराज्यसुखद: सप्तमातृनिषेवित: ।।83।।

सप्तस्वर्लोकमुकुट: सप्तहोता स्वराश्रय: ।
सप्तच्छन्दोनिधि: सप्तच्छन्द: सप्तजनाश्रय: ।।84।।

सप्तसामोपगीतश्चप सप्तपातालसंश्रय: ।
मेधाद: कीर्तिद: शोकहारी दौर्भाग्यनाशन: ।।85।।

सर्वरक्षाकरो गर्भदोषहा पुत्रपौत्रद: ।
प्रतिवादिमुखस्तम्भो रुष्टचित्तप्रसादन: ।।86।।

पराभिचारशमनो दु:खहा बन्धमोक्षद: ।
नवद्वारपुराधारो नवद्वारनिकेतन: ।।87।।

नरनारायणस्तुत्यो नवनाथमहेश्वर: ।
मेखली कवली खड़्गी भ्राजिष्णुर्जिष्णुसारथि: ।।88।।

बहुयोजनविस्तीर्णपुच्छ: पुच्छहतासुर: ।
दुष्टग्रहनिहन्ता च पिशाचग्रहघातक: ।।89।।

बालग्रहविनाशी च धर्मनेता कृपाकर: ।
उग्रकृत्यश्चोग्रवेग उग्रनेत्र: शतक्रतु: ।।90।।

शतमन्युनुत: स्तुत्य: स्तुति: स्तोता महाबल: ।
समग्रगुणशाली च व्यग्रो रक्षोविनाशक: ।।91।।

रक्षोsग्निदाहो ब्रह्मेश: श्रीधरो भक्तवत्सल: ।
मेघनादो मेघरूपो मेघवृष्टिनिवारक: ।।92।।

मेघजीवनहेतुश्च मेघश्याम: परात्मक: ।
समीरतनयो योद्धा नृत्यविद्याविशारद: ।।93।।

अमोघोsमोघदृष्टिश्च इष्टदोsरिष्टनाशन: ।
अर्थोsनर्थापहारी च समर्थो रामसेवक: ।।94।।

अर्थिवन्द्योsसुराराति: पुण्डरीकाक्ष आत्मभू: ।
संकर्षणो विशुद्धात्मा विद्याराशि: सुरेश्वर: ।।95।।

अचलोद्धारको नित्य: सेतुकृद रामसारथि: ।
आनन्द: परमानन्दो मत्स्य: कूर्मो निराश्रय: ।।96।।

वाराहो नारसिंहश्च वामनो जमदग्निज: ।
राम: कृष्ण: शिवो बुद्ध: कल्की रामाश्रयो हरि: ।।97।।

नन्दी भृड़्गी च चण्डी च गणेशो गणसेवित: ।
कर्माध्यक्ष: सुराध्यक्षो विश्रामो जगतीपति: ।।98।।

जगन्नाथ: कपीशश्च सर्वावास: सदाश्रय: ।
सुग्रीवादिस्तुतो दान्त: सर्वकर्मा प्लवंड़्म: ।।99।।

नखदारितरक्षाश्च नखयुद्धविशारद: ।
कुशल: सुधन: शेषो वासुकिस्तक्षकस्तथा ।।100।।

स्वर्णवर्णो बलाढ्यश्च पुरुजेताघनाशन: ।
कैवल्यरूप: कैवल्यो गरुड: पन्नगोरग: ।।101।।

किलकिलरावहतारातिर्गर्वपर्वतभेदन: ।
वज्राड़्गो वज्रदंष्ट्रश्च भक्तवज्रनिवारक: ।।102।।

नखायुधो मणिग्रीवो ज्वालामाली च भास्कर: ।
प्रौढप्रतापस्तपनो भक्ततापनिवारक: ।।103।।

शरणं जीवनं भोक्ता नानाचेष्टो ह्यचंचल: ।
स्वस्तिमान स्वस्तिदो दु:खनाशन: पवनात्मज: ।।104।।

पावन: पवन: कान्तो भक्ताग: सहनो बली ।
मेघनादरिपुर्मेघनादसंहतराक्षस: ।। 105 ।।

क्षरोsक्षरो विनीतात्मा वानरेश: सतां गति: ।
श्रीकण्ठ: शितिकण्ठश्च सहाय: सहनायक: ।।106।।

अस्थूलस्त्वनणुर्भर्गो दिव्य: संसृतिनाशन: ।
अध्यात्मविद्यासारश्च ह्यध्यात्मकुशल: ।।107।।

अकल्मष: सत्यहेतु: सत्यद: सत्यगोचर: ।
सत्यगर्भ: सत्यरूप: सत्य: सत्यपराक्रम: ।।108।।

अंजनाप्राण्लिंड़्गश्च वायुवंशोद्भव: शुभ: ।
भद्ररूपो रुद्ररूप: सुरूपश्चित्ररूपधृक ।।109।।

मैनाकवन्दित: सूक्ष्मदर्शनो विजयो जय: ।
क्रान्तदिड़्मण्डलो रुद्र: प्रकटीकृतविक्रम: ।।110।।

कम्बुकण्ठ: प्रसन्नात्मा ह्रस्वनासो वृकोदर: ।
लम्बौष्ठ: कुण्डली चित्रमाली योगविदां वर: ।।111।।

विपश्चित्कविरानन्दविग्रहोsनल्पशासन: ।
फाल्गुनीसूनुरव्यग्रो योगात्मा योगतत्पर: ।।112।।

योगविद योगकर्ता च योगयोनिर्दिगम्बर: ।
अकारादिहकारान्तवर्णनिर्मितविग्रह: ।।113।।

उलूखलमुख: सिद्धसंस्तुत: प्रथमेश्वर: ।
श्लिष्टड़्घ: श्लिष्टजानु: श्लिष्टपाणि: शिखाधर: ।।114।।

सुशर्मामितशर्मा च नारायणपरायण: ।
जिष्णुर्भविष्णू रोचिष्णुर्ग्रसिष्णु: स्थाणुरेव च ।।115।।

हरिरुद्रानुसेकोsथ कम्पनो भूमिकम्पन: ।
गुणप्रवाह: सूत्रात्मा वीतरागस्तुतिप्रिय: ।।116।।

नागकन्याभयध्वंसी रुक्मवर्ण: कपालभृत ।
अनाकुलो भवोपायोsनपायो वेदपारग: ।।117।।

अक्षर: पुरुषो लोकनाथ: ऋक्षप्रभुर्दृढ: ।
अष्टांड़्गयोगफलभुक सत्यसंध: पुरुष्टुत: ।।118।।

श्मशानस्थाननिलय: प्रेतविद्रावणक्षम: ।
पंचाक्षरपर: पंचमातृको रंजनध्वज: ।।119।।

योगिनीवृन्दवन्द्यश्री: शत्रुघ्नोsनन्तविक्रम: ।
ब्रह्मचारीन्द्रियरिपुर्धृतदण्डो दशात्मक: ।।120।।

अप्रपंच: सदाचार: शूरसेनाविदारक: ।
वृद्ध: प्रमोद: आनन्द: सप्तद्वीपपतिन्धर: ।।121।।

नवद्वारपुराधार: प्रत्यग्र: सामगायक: ।
षटचक्रधाम स्वर्लोकाभयकृन्मानदो मद: ।।122।।

सर्ववश्यकर: शक्तिरनन्तोsनन्तमड़्गल: ।
अष्टमूर्तिर्नयोपेतो विरुप: सुरसुन्दर: ।।123।।

धूमकेतुर्महाकेतु: सत्यकेतुर्महारथ: ।
नन्दिप्रिय: स्वतन्त्रश्च मेखली डमरुप्रिय: ।।124।।

लौहाड़्ग सर्वविद्धन्वी खण्डल: शर्व ईश्वर: ।
फलभुक फलहस्तश्च सर्वकर्मफलप्रद: ।।125।।

धर्माध्यक्षो धर्मपालो धर्मो धर्मप्रदोsर्थद: ।
पंचविंशतितत्त्वज्ञस्तारको ब्रह्मतत्पर: ।।126।।

त्रिमार्गवसतिर्भीम: सर्वदु:खनिर्बहण: ।
ऊर्जस्वान निष्फल: शूली मौलिर्गर्जन्निशाचर: ।।127।।

रक्ताम्बरधरो रक्तो रक्तमाल्यो विभूषण: ।
वनमाली शुभाड़्गश्च श्वेत: श्वेताम्बरो युवा ।।128।।

जयोsजयपरीवार: सहस्त्रवदन: कपि: ।
शाकिनीडाकिनीयक्षरक्षोभूतप्रभंजक: ।।129।।

सद्योजात: कामगतिर्ज्ञानमूर्तिर्यशस्कर: ।
शम्भुतेजा: सार्वभौमो विष्णुभक्त: प्लवड़्गम: ।।130।।

चतुर्नवतिमन्त्रज्ञ: पौलस्त्यबलदर्पहा ।
सर्वलक्ष्मीप्रद: श्रीमानड़्गदप्रिय ईडित: ।।131।।

स्मृतिबीजं सुरेशान: संसारभयनाशन: ।
उत्तम: श्रीपरीवार: श्र्तो रुद्रश्च कामधुक ।।132।।

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देव्यपराधक्षमापनस्तोत्रम् Devyaparaadhkshamapan Stotra

देव्यपराधक्षमापनस्तोत्रम् Devyaparaadhkshamapan Stotra   Published on: 2017-11-27 21:10:42

Written by Gajanan Krishna Maharaj

न मन्त्रं नो यन्त्रं तदपि च न जाने स्तुतिमहो

न चाह्वानं ध्यानं तदपि च न जाने स्तुतिकथा:।

न जाने मुद्रास्ते तदपि च न जाने विलपनं

परं जाने मातस्त्वदनुसरणं क्लेशहरणम्।।1।।

 

विधेरज्ञानेन द्रविणविरहेणालसतया

विधेयाशक्यत्वात्तव  चरणयोर्या च्युतिरभूत्।

तदेतत्क्षन्तव्यं जननि सकलोद्धारिणि शिवे

कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति।।2।।

 

पृथिव्यां पुत्रास्ते जननि बहव: सन्ति सरला:

परं  तेषां  मध्ये  विरलतरलोSहं  तव  सुत:।

मदीयोSयं त्याग: समुचितमिदं नो तव शिवे

कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति।।3।।

 

जगन्मातर्मातस्तव  चरणसेवा न रचिता

न वा दत्तं देवि द्रविणमपि भूयस्तव मया।

तथापि त्वं स्नेहं मयि निरुपमं यत्प्रकुरुषे

कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति।।4।।

 

परित्यक्ता देवा विविधविधिसेवाकुलतया

मया पंचाशीतेरधिकमपनीते तु वयसि।

इदानीं चेन्मातस्तव यदि कृपा नापि भविता

निरालम्बो लम्बोदरजननि कं यामि शरणम्।।5।।

 

श्वपाको जल्पाको भवति मधुपाकोपमगिरा

निरातंको रंको विहरति चिरं कोटिकनकै:।

तवापर्णे कर्णे विशति मनुवर्णे फलमिदं

जन: को जानीते जननि जपनीयं जपविधौ।।6।।

 

चिताभस्मालेपो गरलमशनं दिक्पटधरो

जटाधारी कण्ठे भुजगपतिहारी पशुपति:।

कपाली भूतेशो भजति जगदीशैकपदवीं

भवानि त्वत्पाणिग्रहणपरिपाटीफलमिदम्।।7।।

 

न मोक्षस्याकाड़्क्षा भवविभववाण्छापि च न मे

न विज्ञानापेक्षा शशिमुखि सुखेच्छापि न पुन:।

अतस्त्वां संयाचे जननि जननं यातु मम वै

मृडानी रुद्राणी शिव शिव भवानीति जपत:।।8।।

 

नाराधितासि विधिना विविधोपचारै:

किं रुक्षचिन्तनपरैर्न कृतं वचोभि:।

श्यामे त्वमेव यदि किंचन मय्यनाथे

धत्से कृपामुचितमम्ब परं तवैव।।9।।

 

आपत्सु मग्न: स्मरणं त्वदीयं

करोमि दुर्गे करुणार्णवेशि।

नैतच्छठत्वं मम भावयेथा:

क्षुधातृषार्ता जननीं स्मरन्ति।।10।।

 

जगदम्ब विचित्रमत्र किं परिपूर्णा करुणास्ति चेन्मयि।

अपराधपरम्परावृतं न हि माता समुपेक्षते सुतम्।।11।।

 

मत्सम: पातकी नास्ति पापघ्नी त्वत्समा न हि।

एवं ज्ञात्वा महादेवि यथा योग्यं तथा कुरु।।12।।

इति श्रीमच्छंकराचार्यकृतं देव्यपराधक्षमापनस्तोत्रम्।

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